Wednesday, August 11, 2010

पारसी धर्म: एक ईश्‍वरवाद का संदेश

एक ज़माने में पारसी धर्म ईरान का राजधर्म हुआ करता था। पर सस्सानी शाहों की मुसलमानों के हाथ हार के बाद इसके अनुयाइयों का मुसलमान शाहों द्वारा ज़बर्दस्त उत्पीड़न शुरू हो गया, और जो पारसी मुसलमान नहीं बनना चाहते थे, उन्होंने हिन्दुस्तान में शरण ली । तबसे आज तक पारसियों ने भारत के उदय मे बहुत बड़ा योगदान दिया है।

पारसी त्योहार

नौरोज़

खोरदादसाल

जरथुस्त्रनो

गहम्बर्स

फ्रावार देगन

पपेटी

जमशोद नौरोज़

धर्म के बारे में
प्राचीन फारस (आज का ईरान) जब पूर्वी यूरोप से मध्य एशिया तक फैला एक विशाल साम्राज्य था, तब पैगंबर जरथुस्त्र ने एक ईश्‍वरवाद का संदेश देते हुए पारसी धर्म की नींव रखी।
जरथुस्त्र व उनके अनुयायियों के बारे में विस्तृत इतिहास ज्ञात नहीं है। कारण यह कि पहले सिकंदर की फौजों ने तथा बाद में अरब आक्रमणकारियों ने प्राचीन फारस का लगभग सारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य नष्ट कर डाला था। आज हम इस इतिहास के बारे में जो कुछ भी जानते हैं, वह ईरान के पहाड़ों में उत्कीर्ण शिला लेखों तथा वाचिक परंपरा की बदौलत है।

सातवीं सदी ईस्वी तक आते-आते फारसी साम्राज्य अपना पुरातन वैभव तथा शक्ति गंवा चुका था। जब अरबों ने इस पर निर्णायक विजय प्राप्त कर ली तो अपने धर्म की रक्षा हेतु अनेक जरथोस्ती धर्मावलंबी समुद्र के रास्ते भाग निकले और उन्होंने भारत के पश्चिमी तट पर शरण ली। यहां वे 'पारसी' (फारसी का अपभ्रंश) कहलाए। आज विश्‍वभर में मात्र सवा से डेढ़ लाख के बीच जरथोस्ती हैं। इनमें से आधे से अधिक भारत में हैं।
फारस के शहंशाह विश्तास्प के शासनकाल में पैंगबर जरथुस्त्र ने दूर-दूर तक भ्रमण कर अपना संदेश दिया। उनके अनुसार ईश्‍वर एक ही है (उस समय फारस में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी)। इस ईश्‍वर को जरथुस्त्र ने 'अहुरा मजदा' कहा अर्थात 'महान जीवन दाता'।
अहुरा मजदा कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि सत्व है, शक्ति है, ऊर्जा है। जरथुस्त्र के दर्शनानुसार विश्‍व में दो आद्य आत्माओं के बीच निरंतर संघर्ष जारी है।
इनमें एक है अहुरा मजदा की आत्मा, 'स्पेंता मैन्यू'। दूसरी है दुष्ट आत्मा 'अंघरा मैन्यू'। इस दुष्ट आत्मा के नाश हेतु ही अहुरा मजदा ने अपनी सात कृतियों यथा आकाश, जल, पृथ्वी, वनस्पति, पशु, मानव एवं अग्नि से इस भौतिक विश्व का सृजन किया। वे जानते थे कि अपनी विध्वंसकारी प्रकृति तथा अज्ञान के चलते अंघरा मैन्यू इस विश्व पर हमला करेगा और इसमें अव्यवस्था, असत्य, दुःख, क्रूरता, रुग्णता एवं मृत्यु का प्रवेश करा देगा।
मनुष्य, जो कि अहुरा मजदा की सर्वश्रेष्ठ कृति है, की इस संघर्ष में केन्द्रीय भूमिका है। उसे स्वेच्छा से इस संघर्ष में बुरी आत्मा से लोहा लेना है। इस युद्ध में उसके अस्त्र होंगे अच्छाई, सत्य, शक्ति, भक्ति, आदर्श एवं अमरत्व। इन सिद्धांतों पर अमल कर मानव अंततः विश्व की तमाम बुराई को समाप्त कर देगा। कुछ अधिक वैज्ञानिक कसौटी पर धर्म को परखने वाले 'स्पेंता मैन्यू' की व्याख्या अलग तरह से करते हैं। इसके अनुसार 'स्पेंता मैन्यू' कोई आत्मा नहीं, बल्कि संवृद्धिशील, प्रगतिशील मन अथवा मानसिकता है। अर्थात यह अहुरा मजदा का एक गुण है, वह गुण जो ब्रह्माण्ड का निर्माण एवं संवर्द्धन करता है। ईश्वर ने स्पेंता मैन्यू का सृजन इसीलिए किया था कि एक आनंददायक विश्व का निर्माण किया जा सके।
प्रगतिशील मानसिकता ही पृथ्वी पर मनुष्यों को दो वर्गों में बांटती है। सदाचारी, जो विश्व का संवर्द्धन करते हैं तथा दुराचारी, जो इसकी प्रगति को रोकते हैं। जरथुस्त्र चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर तुल्य बने, जीवनदायी ऊर्जा को अपनाए तथा निर्माण, संवर्द्धन एवं प्रगति का वाहक बने।
पैगंबर जरथुस्त्र के उपदेशों के अनुसार विश्व एक नैतिक व्यवस्था है। इस व्यवस्था को स्वयं को कायम ही नहीं रखना है, बल्कि अपना विकास तथा संवर्द्धन भी करना है। जरथोस्ती धर्म में जड़ता की अनुमति नहीं है।
विकास की प्रक्रिया में बुरी ताकतें बाधा पहुंचाती हैं, परंतु मनुष्य को इससे विचलित नहीं होना है। उसे सदाचार के पथ कर कायम रहते हुए सदा विकास की दिशा में बढ़ते रहना है। जीवन के प्रत्येक क्षण का एक निश्चित उद्देश्य है। यह कोई अनायास शुरू होकर अनायास ही समाप्त हो जाने वाली चीज नहीं है। सब कुछ ईश्वर की योजना के अनुसार होता है। सर्वोच्च अच्छाई ही हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। मनुष्य को अच्छाई से, अच्छाई द्वारा, अच्छाई के लिए जीना है। 'हुमत' (सद्विचार), 'हुउक्त' (सद्वाणी) तथा 'हुवर्षत' (सद्कर्म) जरथोस्ती जीवन पद्धति के आधार स्तंभ हैं।
जरथोस्ती धर्म में मठवाद, ब्रह्मचर्य, व्रत-उपवास, आत्म दमन आदि की मनाही है। ऐसा माना गया है कि इनसे मनुष्य कमजोर होता है और बुराई से लड़ने की उसकी ताकत कम हो जाती है। निराशावाद व अवसाद को तो पाप का दर्जा दिया गया है। जरथुस्त्र चाहते हैं कि मानव इस विश्व का पूरा आनंद उठाए, खुश रहे। वह जो भी करे, बस एक बात का ख्याल अवश्य रखे और वह यह कि सदाचार के मार्ग से कभी विचलित न हो।
भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न जीवन की मनाही नहीं है, लेकिन यह भी कहा गया है कि समाज से तुम जितना लेते हो, उससे अधिक उसे दो। किसी का हक मारकर या शोषण करके कुछ पाना दुराचार है। जो हमसे कम सम्पन्न हैं, उनकी सदैव मदद करना चाहिए।
जरथोस्ती धर्म में दैहिक मृत्यु को बुराई की अस्थायी जीत माना गया है। इसके बाद मृतक की आत्मा का इंसाफ होगा। यदि वह सदाचारी हुई तो आनंद व प्रकाश में वास पाएगी और यदि दुराचारी हुई तो अंधकार व नैराश्य की गहराइयों में जाएगी, लेकिन दुराचारी आत्मा की यह स्थिति भी अस्थायी है। आखिर जरथोस्ती धर्म विश्व का अंतिम उद्देश्य अच्छाई की जीत को मानता है, बुराई की सजा को नहीं। अतः यह मान्यता है कि अंततः कई मुक्तिदाता आकर बुराई पर अच्छाई की जीत पूरी करेंगे। तब अहुरा मजदा असीम प्रकाश के रूप में सर्वसामर्थ्यवान होंगे। फिर आत्माओं का अंतिम फैसला होगा। इसके बाद भौतिक शरीर का पुनरोत्थान होगा तथा उसका अपनी आत्मा के साथ पुनर्मिलन होगा। समय का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और अहुरा मजदा की सात कृतियाँ शाश्वत धन्यता में एक साथ आ मिलेंगी और आनंदमय, अनश्वर अस्तित्व को प्राप्त करेंगी।

Tuesday, July 20, 2010

शिव-पार्वती का घर है कैलाश मानसरोवर

प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि हिमालय जैसा कोई दूसरा पर्वत नहीं है। यहां भगवान का निवास है क्योंकि यहां कैलाश और मानसरोवर स्थित हैं। कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। सदियों से देवता, दानव, योगी, मुनि और सिद्ध महात्मा यहां तपस्या करते आए हैं।

कैलाश पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 20 हजार फीट है। इसलिए तीर्थयात्रियों को कई पर्वत-ऋंखलाएं पार करनी पड़ती हैं। यह यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है हिन्दू धर्मं के अनुसार कहते है की जिसको भोले बाबा का बुलावा होता है वही इस यात्रा को कर सकता है। भारत सरकार के सौजन्य से हर वर्ष मई-जून में सैकड़ों तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं। इसके लिए उन्हें भारत की सीमा लांघकर चीन में प्रवेश करना पड़ता है, क्योंकि यात्रा का यह भाग चीन में है। सामान्यतया यह यात्रा 28 दिन में पूरी होती है। भारतीय भू भाग में चोथे दिन से पैदल यात्रा शुरू होती है। भारतीय सीमा में कुमाउ मंडल विकास निगम इस यात्रा को संपन्न कराती है।

कैलाश परिक्रमा
कैलाश पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यदि आप इसकी परिक्रमा करना चाहते हैं, तो यह परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। यहां से कैलाश पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है, मानों भगवान शिव स्वयं बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस चोटी को हिमरत्न भी कहा जाता है।

गौरीकुंड
कैलाश पर्वत की परिक्रमा के दौरान आपको एक किलोमीटर परिधि वाला गौरीकुंड भी मिलेगा। यह कुंड हमेशा बर्फ से ढंका रहता है, लेकिन तीर्थयात्री बर्फ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करना नहीं भूलते। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि गौरीकुंड में स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।


पवित्र झील 'मानसरोवर'
मानसरोवर यह पवित्र झील समुद्र तल से लगभग 4 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है और लगभग 320 बर्ग किलोमीटर में फैली हुई है। यहीं से एशिया की चार प्रमुख नदियां-ब्रह्मपुत्र, करनाली, सिंधु और सतलज निकलती हैं। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर (झील) की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति झील का पानी पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है। जनश्रुतियां हैं कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर बनाया है। दरअसल, मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। मान्यता है कि ब्रह्ममुहुर्त में देवता गण यहां स्नान करते हैं। शक्त ग्रंथ के अनुसार, सती का हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। इसलिए इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है।
गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज भी सुनाई देती है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह मृदंग की आवाज है। मान्यता यह भी है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह रुद्रलोक पहुंच सकता है।

राक्षस ताल
मानसरोवर के बाद आप राक्षस ताल की यात्रा करेंगे। यह लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। प्रचलित है कि रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं। एक छोटी नदी गंगा-चू दोनों झीलों को जोड़ती है। हिंदू के अलावा, बौद्ध और जैन धर्म में भी कैलाश मानसरोवर को पवित्र तीर्थस्थान के रूप में देखा जाता है। बौद्ध समुदाय कैलाश पर्वत को कांग रिनपोचे पर्वत भी कहते हैं। उनका मानना है कि यहां उन्हें आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि मानसरोवर के पास ही भगवान बुद्ध महारानी माया के गर्भ में आये। जैन धर्म में कैलाश को अष्टपद पर्वत कहा जाता है। जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि जैन धर्म गुरु ऋषभनाथ को यहीं पर आध्यात्मिक ज्ञान मिला था।

यात्रा से पहले कुछ बातें ध्यान रखें
कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने से पहले तीर्थयात्रियों को कुछ बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। उन्हें किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं होनी चाहिए। चूंकि यह तीर्थस्थान चीन की सीमा में स्थित है, इसलिए उन्हें विदेश मंत्रालय में अपना प्रार्थनापत्र देना होता है। चीन से वीजा मिलने के बाद ही आप कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकते हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पताल में दो दिन तक आपके फिजिकल फिटनेस की जांच की जाती है। जांच में फिट होने के बाद ही आपको इस यात्रा की अनुमति मिल पाती है। दरअसल, कैलाश मानसरोवर की यात्रा के दौरान आपको 20 हजार फीट की ऊंचाई तक भी जाना पड़ सकता है। इसी कारण इस यात्रा को धार्मिक यात्रा के साथ ही प्राकृतिक रूप से प्रकर्ति से रू-ब-रू व प्राकृतिक सौंदर्य को जानने के लिए भी जाना जाता है।

 कुछ विशेष तथ्यों का ध्यान रखें

इस स्थान तक पहुंचने के लिए कुछ विशेष तथ्यों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे इसकी ऊँचाई 3500 मीटर से भी अधिक है। यहां पर ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ आदि परेशानियां हो सकती हैं। इन परेशानियों की वजह शरीर को नए वातावरण का प्रभावित करना है।

भारत से कैलाश कैसे पहुंचें ?
• भारत से सड़क मार्ग। भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहां के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है। 
• वायु मार्ग। वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंचकर वहां से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है।
• कैलाश तक जाने के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर वहां से हिलसा तक हेलीकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है। मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।
• काठमांडू से ल्‍हासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों- शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर जा सकते हैं।

Sunday, July 18, 2010

माता वैष्णो देवी की यात्रा

पहाड़ों वाली माता वैष्णो देवी सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उनके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। लोग मानते हैं कि माता जब बुलाती हैं तो भक्त किसी न किसी बहाने से उनके दरबार पहुंच ही जाता है। जो बिना बुलाए जाता है, वह कितना ही चाहे माता के दर्शन नहीं कर पाता। हसीन वादियों में त्रिकूट पर्वत पर गुफा में विराजित माता वैष्णो देवी का मंदिर हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहां दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए आते हैं।

कैसे पहुंचें वैष्णो मां के दरबार
मां वैष्णो देवी के दर्शन करने के इच्छुक श्रद्धालुओं का पहला पड़ाव जम्मू होता है। जम्मू तक आप बस, टैक्सी, ट्रेन या फिर हवाई जहाज से पहुंच सकते हैं। गर्मियों में वैष्णो देवी जाने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है इसलिए रेलवे द्वारा हर साल यात्रियों की सुविधा के लिए दिल्ली से जम्मू के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाती हैं। जम्मू भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग एक से जुड़ा है। इसलिए यदि आप बस या टैक्सी से भी जम्मू पहुंचना चाहते हैं तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी। उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों से जम्मू के लिए आपको आसानी से सीधी बस और टैक्सी मिल सकती है।

मां के भवन तक, यात्रा की शुरुआत का बेस कैंप कटरा होता है, जो कि जम्मू जिले का एक गांव है। जम्मू से कटरा की दूरी लगभग 50 किमी है। कटरा और जम्मू के बीच बस और टैक्सी सेवा चलती है। कटरा समुद्रतल से 2500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। कटरा तक आप आसानी से बस या टैक्सी से पहुंच सकते हैं। जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए भी कई बसें मिल जाएंगी, जिनसे आप लगभग 2 घंटे में कटरा पहुंच सकते हैं।

वैष्णों देवी यात्रा की शुरुआत
मां वैष्णो देवी यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है। अधिकांश यात्री यहां आराम करके अपनी यात्रा की शुरुआत करते हैं। कटरा से अर्धकुंवारी मंदिर की दूरी 8 किमी और मां के मुख्य मंदिर तक की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है। मां की पवित्र गुफा से भैरवनाथ की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। मां के दर्शन के लिए रातभर यात्रियों की चढ़ाई का सिलसिला चलता रहता है।
कटरा से ही माता के दर्शन के लिए नि:शुल्क 'यात्रा पर्ची' मिलती है। पर्ची लेने के बाद ही आप कटरा से मां वैष्णो के दरबार तक की चढ़ाई की शुरुआत कर सकते हैं। पर्ची लेने के तीन घंटे बाद आपको चढ़ाई शुरू होने से पहले 'बाण गंगा' चेक प्वाइंट पर इंट्री करानी पड़ती है और वहां सामान की चेकिंग कराने के बाद ही आप चढ़ाई शुरू कर सकते हैं। यदि आप यात्रा पर्ची लेने के तीन घंटे बाद तक चेक पोस्ट पर इंट्री नहीं कराते हैं तो आपकी यात्रा पर्ची रद्द हो सकती है। हमेशा ध्यान रखें कि यात्रा प्रारंभ करते समय ही यात्रा पर्ची लें। जो लोग कठिन चढ़ाई करने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए बाण गंगा से पालकी, और घोड़े की सुविधा है। अब तो मंदिर प्रशासन द्वारा अर्धकुंवारी मंदिर से माता के मुख्य द्वार तक बैट्री चालित ऑटो भी चलाया जा रहा है। जिसमें एक बार में पांच-छह यात्री आराम से यात्रा कर सकते हैं।

जलपान और भोजन की व्यवस्था
चढ़ाई के दौरान रास्ते भर में जगह-जगह पर जलपान और भोजन करने की व्यवस्था है। जिसका भुगतान करके आप यह सुविधा ले सकते हैं। कम समय में मां के दर्शन के इच्छुक यात्री हेलीकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं। लगभग 2200 से 2800 रुपए खर्च कर दर्शनार्थी कटरा से 'सांझीछत' (भैरवनाथ मंदिर से कुछ किमी की दूरी पर स्थित) तक हेलीकॉप्टर से पहुंच सकते हैं। कटरा और मुख्य भवन तक की चढ़ाई के दौरान कुछ स्थानों पर अपना सामान रखने के लिए निशुल्क 'क्लॉक रूम' की सुविधा भी उपलब्ध है।

माता वैष्णो देवी को लेकर मान्यताएं
माता वैष्णो देवी को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीन काल से चली आ रही मान्यता के अनुसार माता वैष्णो के भक्त श्रीधर ने एक बार अपने गांव में माता का भण्डारा रखा और सभी गांववालों व साधु-संतों को भंडारे में आने का निमंत्रण दिया। गांववालों को पहले गरीब श्रीधर की बातों पर यकीन नहीं हुआ। फिर भी वह भंडारे में गए। वैष्णो माता भी अपने भक्त श्रीधर की लाज रखने के लिए कन्या का रूप धर कर भण्डारे में आईं थी। श्रीधर ने भैरवनाथ को भी अपने शिष्यों के साथ आमंत्रित किया गया था। भंडारे में भैरवनाथ ने खीर-पूड़ी की जगह मांस और मदिरा सेवन करने की बात की। श्रीधर ने इस पर असहमति जताई।
भोजन को लेकर भैरवनाथ के हठ पर अड़ जाने के कारण कन्यारूपी माता ने भी भैरवनाथ को समझाना चाहा, लेकिन भैरवनाथ ने उसकी बात अनसुनी कर दी। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब कन्या रूपी माता वैष्णो देवी वहां से त्रिकूट पर्वत की ओर भागीं और एक गुफा में नौ माह तक तपस्या की। जिस गुफा में माता ने तपस्या की वह गुफा 'अर्धकुंवारी' के नाम से प्रसिद्घ है। कहते हैं जब माता तपस्या कर रही थीं, तो माता की रक्षा के लिए हनुमान जी ने गुफा के बाहर पहरा दिया। अर्धकुंवारी के पास ही माता की चरण पादुका भी है। कहावत के अनुसार यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। मान्यता के अनुसार उस वक्त भी हनुमान जी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमान जी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा 'बाणगंगा' के नाम से जानी जाती है। बाणगंगा का पवित्र जल पीने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

'भवन'
जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान 'पवित्र गुफा' अथवा 'भवन' के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर मां काली, सरस्वती और लक्ष्मी के पिंड रूप में क्रमश: दाएं, मध्य और बाएं विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। मान्यता के अनुसार जब माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध किया था तो उसका शीश भवन से 8 किमी दूर जिस स्थान पर गिरा, उस स्थान को 'भैरोनाथ के मंदिर' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्‍चाताप हुआ और उसने मां से क्षमा याचना की। माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं।

ठहरने का स्थान
माता के भवन में पहुंचने वाले यात्रियों के लिए जम्मू, कटरा, भवन के आसपास मां वैष्णो देवी मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित कई धर्मशालाएं व होटल हैं, जिनमें विश्राम करके आप अपनी यात्रा की थकान मिटा सकते हैं। पहले से बुकिंग कराके आप परेशानियों से बच सकते हैं। आप चाहें तो प्राइवेट होटलों में भी रुक सकते हैं। 400 रुपए तक अच्छा और सस्ता गेस्ट हाउस मिल जाएगा।

नवरात्रों के दौरान ध्यान दें
नवरात्रों के दौरान मां वैष्णो देवी के दर्शन करने की विशेष मान्यता है। इस दौरान पूरे नौ दिनों तक प्रतिदिन देश और विदेशों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कई बार तो श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है कि कटरा के पर्ची काउंटर से यात्रा की पर्ची देने पर रोक लगानी पड़ती है।

मां वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान रखें ख्याल
* चढ़ाई के वक्त अपने साथ कम से कम सामान ले जाने की कोशिश करें, जिससे चढ़ाई में आपको परेशानी न हो।
* पैदल चढ़ाई करने में ट्रेकिंग शूज और छड़ी आपके लिए बेहद मददगार साबित होगी।
* वैसे तो मां वैष्णो देवी के भक्त उनके दर्शनार्थ साल भर जाते हैं, लेकिन यहां जाने का बेहतर मौसम गर्मी है।

* सर्दियों में मां के मुख्य भवन का न्यूनतम तापमान माइनस तीन से माइनस चार डिग्री तक हो जाता है और सर्दियों के मौसम मे चट्टानों के खिसकने का खतरा भी रहता है। इसलिए इस मौसम में यात्रा करने से बचें।
* ब्लड प्रेशर के मरीज हमेशा चढ़ाई के लिए सीधे रास्ते का प्रयोग करें, सीढिय़ों का उपयोग कतई न करें।
* अपने साथ आवश्यक दवाइयां जरूर रखें।
यात्रा का समय- साल भर
निकटतम हवाई अड्डा- जम्मू
रेलवे स्टेशन- जम्मू
यात्रा का रूट- जम्मू से कटरा- 48 किमी., कटरा से वैष्णो देवी- पैदल 13 किमी.
दिल्ली से कुल दूरी- 663 किमी.

सालासर बालाजी मंदिर

राजस्थान के चुरू जिले में स्थित है सालासर बालाजी का मंदिर। जयपुर बीकानेर सड़क मार्ग पर स्थित सालासर धाम हनुमान भक्तों के बीच शक्ति स्थल के रूप में जाना जाता है। भक्तों की इस मंदिर में अगाध आस्था है। आपको यहां हर दिन हजारों की संख्या में देशी-विदेशी भक्त मत्था टेकने के लिए कतारबद्ध खड़े दिखाई देंगे।


कैसे पहुंचें बालाजी
जयपुर से लगभग 2 घंटे के सफर के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। यहां हनुमान जी की वयस्क मूर्ति स्थापित है, इसलिए भक्तगण इसे बड़े हनुमान जी पुकारते हैं। एक कथा के अनुसार, राजस्थान के नागौर जिले के एक छोटे से गांव असोता में संवत 1811 में शनिवार के दिन खेत की जुताई करते समय एक किसान का हल रुक गया। हल किसी शिला से टकरा गया था। वह तिथि श्रावण शुक्ल नवमी थी।
उसने उस स्थान की खुदाई की, तो मिट्टी और बालू से ढंकी हनुमान जी की प्रतिमा निकली। किसान और उसकी पत्नी ने इसे साफ किया और घटना की जानकारी गांव के लोगों को दी। माना जाता है कि उस रात असोता के जमींदार ने रात में स्वप्न देखा कि हनुमान जी कह रहे हैं कि मुझे असोता से ले जाकर सालासार में स्थापित कर दो। ठीक उसी रात सालासर के एक हनुमान भक्त मोहनदास को भी हनुमान जी ने स्वप्न दिया कि मैं असोता में हूं, मुझे सालासर लाकर स्थापित करो। अगली सुबह मोहनदास ने अपना सपना असोता के जमींदार को बताया। यह सुनकर जमींदार को आश्चर्य हुआ और उसने बालाजी (हनुमान जी) का आदेश मानकर प्रतिमा को सालासर में स्थापित करा दिया। धीरे-धीरे यह छोटा सा कस्बा सालासर धाम के नाम से विख्यात हो गया।
मंदिर परिसर में हनुमान भक्त मोहनदास और कानी दादी की समाधि है। यहां मोहनदास जी के जलाए गए अग्नि कुंड की धूनी आज भी जल रही है। भक्त इस अग्नि कुंड की विभूति अपने साथ ले जाते हैं। मान्यता है कि विभूति सारे कष्टों को हर लेती है। पिछले बीस वर्षो से यहां पवित्र रामायण का अखंड कीर्तन हो रहा है, जिसमें यहां आने वाला हर भक्त शामिल होता है और बालाजी के प्रति अपनी आस्था प्रकट करता है। चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा के दिन प्रतिवर्ष यहां बहुत बड़ा मेला लगता है।

Saturday, July 17, 2010

केदारनाथ की यात्रा

उत्तराखंड में चार ऐसे प्रमुख धाम यानी तीर्थ स्थल हैं, जिनके दर्शन के लिए  भक्तों की भारी भीड उमडती है। इनके नाम हैं- केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री। केदारनाथ धाम के कपाट 18 मई से और बद्रीनाथ के कपाट 19 मई से खुल चुके  हैं।
आमतौर पर गंगोत्री और यमुनोत्री के बाद श्रद्धालु केदारनाथ की यात्रा करते हैं। उत्तरांचल के रुद्रप्रयाग जिले में है केदारनाथ। प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य, आस्था और भक्ति का संगम है केदारनाथ धाम। यहां पहुंचने के लिए आपको पहाडों की श्रृंखला के अद्भुत नजारों के बीच सर्पीली सडक से गौरी कुंड तक पहुंचना होगा। यहां से आगे 14 किमी. की यात्रा आपको पैदल ही करनी होगी। इस यात्रा के बाद जब आप केदारनाथ के पास पहुंचते हैं, तो पहाडों से उतरती मंदाकिनी का जल दूध के समान सफेद दिखाई पडता है। चौराबारी हिमनद के कुंड से निकली है मंदाकिनी नदी। केदारनाथ पर्वत शिखर के समीप है केदारनाथ मंदिर, जो समुद्र तल से 3562 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह कत्यूरी शैली में बना दर्शनीय मंदिर है। इसका जीर्णोद्धार जगत गुरु शंकराचार्य ने करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में सदाशिव प्रतिष्ठित हैं। पांच रूपों में विराजमान होने के कारण शिवलिंग पंच केदार कहलाते हैं।
केदारनाथ ज्योतिर्लिग
 भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है केदारनाथ। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार, केदारनाथ में शिवलिंग, तुंगनाथ में बाहु, रुद्रनाथ में मुख, मध्य महेश्वर में नाभि, कल्पेश्वर में जटा के रूप में शिव की पूजा की जाती है। केदारनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी की जीवंत मूर्ति स्थापित की गई है। हर साल मई से अक्टूबर के बीच केदारनाथ के दर्शन किए जाते हैं। यहां नागनाथ शरदोत्सव, जोशीमठ शरदोत्सव, शिवरात्रि गोपेश्वरनंदा देवी नौटी, नवमी जसोली हरियाली, रूपकुंड महोत्सव बेदनी बुग्याल, कृष्णा मेला जोशी मठ, गौचर मेला, अनुसूया देवी आदि कई मेले आयोजित होते हैं। केदारनाथ के निकट ही गांधी सरोवर व बासुकी ताल है।
रुद्रनाथ गुहा मंदिर
मंदाकिनी और अलकनंदा नदी के बीचों-बीच स्थित है रुद्रनाथ गुहा मंदिर। यहां गुहा को एक भित्ति बनाकर बंद कर दिया गया है। आंतरिक भाग में शिवलिंग है, जिस पर जल की बूंदें टपकती रहती हैं।
कल्पेश्वर
 केदारखंड पुराण में उल्लेख है कि कल्पस्थल में दुर्वासा ऋषि ने कल्पवृक्ष के नीचे तपस्या की थी। कल्पेश्वर कल्पगंगा घाटी में स्थित है। कल्पगंगा का प्राचीन नाम हिरण्यवती था। दायें तट पर दूरबसा भूमि है, जहां ध्यान बद्री का मंदिर है। विशाल कल्पेश्वर चट्टान के पाद में गुहा है, जिसके गर्भ में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान हैं।
मध्य महेश्वर
 स्थापत्य की दृष्टि से यह पंच केदारों में सर्वाधिक आकर्षक है। मंदिर का शिखर स्वर्ण कलश से अलंकृत है। पृष्ठभाग में हर गौरी की प्रतिमाएं हैं। छोटे मंदिर में पार्वती की मूर्ति है। मंदिर के मध्य भाग में नाभि क्षेत्र के समान एक लिंग है। मान्यता है कि मध्य महेश्वर लिंग के दर्शन मात्र से मनुष्य स्वर्ग में स्थान पा लेता है। मध्य महेश्वर से 2 किमी. मखमली घास और फूलों से भरपूर ढालों को पार कर बूढा मध्य महेश्वर है, जहां क्षेत्रपाल देवता मंदिर है। इसमें धातु निर्मित मूर्ति स्थापित है। इससे आगे ताम्र पात्र में प्राचीन मुद्राएं रखी हैं। गुप्त काशी से 7 किमी. दूर काली मठ में काली मां का गोलाकार मंदिर है।
तुंगनाथ
चंद्रशिलाशिखर (3680 मीटर) के नीचे तुंगनाथ विद्यमान है। तराशे प्रस्तरों से निर्मित तुंगनाथ मंदिर लगभग ग्यारह मीटर ऊंचा है। इसके शिखर पर 1.6 मीटर ऊंचा स्वर्ण कलश है। सभा मण्डप के ऊपर गजसिंह है। यह काले रंग के पिण्डाकार शिवलिंग से सुशोभित है। इसके अलावा, यहां स्वर्ण और रजत से बनी पांच प्रतिमाएं हैं। तुंगनाथ से दस किमी. दूरी पर देवरिया ताल है। इसके जल में बद्रीनाथ शिखर मन मोह लेता है।

बाबा बर्फानी की पवित्र यात्रा

बाबा बर्फानी गुफा की खोज 16वीं शताब्दी में एक मुसलमान गडरिए ने की थी। हालांकि यात्रा की संपूर्ण व्यवस्था श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड संभालता है, लेकिन आज भी चढावे का चौथा हिस्सा उस परिवार के वंशजों को जाता है। अस्वस्थ और चलने में अक्षम यात्रियों को पौनी पर बिठाकर पवित्र गुफा तक ले जाने वाले और सामान ढोने वाले कुली आदि सभी मुस्लिम संप्रदाय के होते हैं। उनके लिए आर्थिक संबल प्रदान करने वाली इस यात्रा का वे साल भर इंतजार करते हैं। श्रद्धालुओं की सेवा में लगे लंगर वालों के चेहरे पर किसी धर्म या जाति के चिह्न नहीं, बल्कि शिव की भक्ति के भाव नजर आते हैं।
शुक्ल पक्ष में बढता है शिवलिंग 
 समुद्र तल से 13,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुफा जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में है। 16मीटर चौडी और लगभग 11 मीटर लंबी यह गुफा भगवान शिव के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। इस गुफा में प्राकृतिक हिमलिंग बनता है। गुफा में जगह-जगह से पानी टपकता रहता है, जिससे छोटे-बडे कई हिम खंडों का निर्माण हो जाता है। भगवान शिव का हिमलिंग प्राकृतिक रूप से ठोस बर्फ का होता है। शुक्ल पक्ष के दौरान इस हिमलिंग का आकार अपने आप बढने लगता है, जबकि कृष्ण पक्ष में चंद्रमा के आकार के साथ इसका आकार भी घट जाता है।
हर आम और खास के लिए है  यात्रा
बाबा बर्फानी की इस पवित्र यात्रा में सभी श्रद्धालु एक बराबर होते हैं। यहां कोई भी वीआईपी नहीं होता। सभी को १५ रुपये के यात्रा पंजीकरण के साथ ही यात्रा करनी होती है। ठहरने के लिए जम्मू और पहलगाम में सभी यात्रियों के लिए निशुल्क व्यवस्था होती है। इस बार से हेलीकॉप्टर का किराया २४५० रुपये होने की वजह से आम यात्री भी इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

प्रकृति से मिलाप की यात्रा
 यात्रा की शुरुआत आधार शिविर जम्मू से होती है। जम्मू का मौसम धूप और गर्मी वाला होता है, वहीं जम्मू से ऊधमपुर की तरफ बढते हुए हवा में हल्की नमी का एहसास होने लगता है। यात्रा की औपचारिक शुरुआत पहलगाम से होती है। यात्रा मार्ग में पडने वाली शेष नाग झील नीले दर्पण के समान लगती है,वहीं लिद्दर दरिया की अनियंत्रित लहरें यात्रियों को अपना वेग दर्शाती हैं। पिस्सु टॉप की चढाई चढते हुए पहाडों की कठिन जिंदगी का अनुभव होता है। यहां आकर प्राकृतिक और आध्यात्मिक सुख का अनुभव होता है।

मन चंगा तो कठौती में गंगा

तीर्थ अनेकार्थी शब्द है, जिसका अर्थ है पवित्र करने वाला। श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है कि संत और महापुरुष भगवदीय गुणों की संपन्नता के कारण ही परम तीर्थ कहे जाते हैं-तीर्थोकुर्वन्ति तीर्थानि। स्कन्द पुराण में भी कहा गया है कि तीर्थ करने का मुख्य प्रयोजन संत-दर्शन का लाभ प्राप्त करना होता है। अत:जिस भू-भाग में संत-महात्मा निवास करते हैं, वह तीर्थ कहलाता है। इसी प्रसंग में नारद सूक्ति में कहा गया है-संत महापुरुष तीर्थ को सुतीर्थ,कर्मो को सुकर्म और शास्त्रों को सद्शास्त्रबना देते हैं,क्योंकि साधुजनलौकिक और पारलौकिक मोह-वासनाओं से विरत, भगवदीय गुणों से युक्त होने के कारण शांतचित्त होते हैं। साधुजनस्वयं ही चलते-फिरते तीर्थ जैसे ही हैं। तीर्थो का फल तो समयानुसार ही मिलता है, किंतु संत-समागम का फल तत्काल प्राप्त हो जाता है। साधुजनभगवन्नामकी महिमा का गान करते हुए कहते हैं-जहां भगवान की कथा होती है वहां सभी तीर्थ आ जाते हैं।
मन की शुद्धि पर बल देते हुए महापुरुषों ने मन को ही परमतीर्थमाना है। स्कंदपुराणमें सप्त पुरियोंकी ही भांति सत्य, क्षमा, इन्द्रिय-संयम, दया, प्रियवचन, ज्ञान और तप को सप्ततीर्थके रूप में स्वीकार करते हुए इन्हें मानस तीर्थ की संज्ञा दी गई है। पवित्र जल से काया के वाह्य भाग को धो लेना ही आवश्यक नहीं होता,वरन् वाह्य-शुद्धि के साथ-साथ अंत:शुद्धिभी आवश्यक होती है-स्वमनो विशुद्धम्अर्थात् अपने मन की शुद्धि ही परम तीर्थ है। तुलसीदास जी ने कहा है-प्रेम भगतिजल बिनुरघुराई। अभिअंतरमल कबहून जाई। इसी प्रकार गुरु, माता-पिता, अतिथि आदि के वचन भी अंत:करण के राग द्वेषादिविकारों को दूर करते हुए मन को निर्मल कर तीर्थ बना देते हैं। सर्वतीर्थका आधार हमारी श्रद्धा और विश्वास ही है। तीर्थ का राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि के साथ ही विभिन्न प्रदेशों के रहन-सहन, भाषा-शैली, उपासना-पद्धति, वेश-भूषा, विचार, व्यवहार, परस्पर सद्भाव के माध्यम से एकसूत्र में बांधते हुए संपूर्ण राष्ट्र को वसुधैव कुटुम्बकम्की पुनीत धारणा के महत्व का द्योतक हैं। तीर्थ मानव-जीवन में आध्यात्मिक चेतना के संव‌र्द्धन और नवीन चिंतन-शक्ति के सत्प्रेरक हैं।